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सरकार ओसीसीआरपी की साख पर सवाल उठा रही

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हरिशंकर व्यास
कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी पर आरोप है कि वे देश में विकास को बाधित कर रहे हैं, निवेश रोकना चाहते हैं, देश को बदनाम कर रहे हैं आदि आदि। सवाल है कि क्या गौतम अडानी के खिलाफ कोई बात कहना देश के खिलाफ बोलना हो गया? पहले तो भाजपा और केंद्र सरकार के इकोसिस्टम ने यह नैरेटिव बनाया कि सरकार के खिलाफ या नरेंद्र मोदी के खिलाफ बोलना देश के खिलाफ बोलना होता है। उन्होंने प्रधानमंत्री और सरकार को ही देश बना दिया। अब क्या नरेंद्र मोदी वाली स्थिति ही गौतम अडानी की भी देश में बना रहे है, जो उनके खिलाफ बोलने को भी देश के खिलाफ बोलना कहा जाएगा?

इसी तरह दूसरा सवाल यह है कि ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट यानी ओसीसीआरपी की किसी रिपोर्ट का हवाला देना देश विरोधी कैसे हो गया? यह संस्था तो पूरी दुनिया में भ्रष्टाचार और संगठित अपराध के मामले खोलती है। इसका मतलब है कि संस्था भ्रष्टाचार विरोधी है। तो भ्रष्टाचार विरोधी संस्था भारत विरोधी संस्था कैसे हो गई? संस्था की रिपोर्ट भ्रष्टाचार के खिलाफ है और हम कह रहे हैं कि भारत के खिलाफ है। भाजपा का राहुल गांधी के ऊपर सबसे ज्यादा हमला इस बात को लेकर है कि उन्होंने ओसीसीआरपी की रिपोर्ट का बार बार हवाला दिया है। इस संस्था ने पेगासस से जासूसी का मामला खोला था और अडानी समूह द्वारा शेयर बाजार में हेराफेरी का भी खुलासा किया था। संस्था ने जो खुलासा किया उसके मेरिट पर बात करने की बजाय सरकार संस्था की साख पर सवाल उठा रही है।

बहरहाल, राहुल गांधी इस संस्था की रिपोर्ट का हवाला देकर सरकार को कठघऱे में खड़ा कर रहे हैं तो उनके एजेंडे पर सवाल उठाया जा रहा है और उनको देश विरोधी बताया जा रहा है। लेकिन ऐसा नहीं है कि वे यह मुद्दा नहीं उठाएंगे तो दुनिया इसके बारे में नहीं जानेगी। ओसीसीआरपी वैश्विक संस्था है, जिसमें दुनिया भर के पत्रकार जुड़े हैं यह रिपोर्ट दुनिया भर में देखी जाती है। इसका मतलब है कि राहुल गांधी मुद्दा नहीं भी उठाएं तब भी दुनिया के लोग जानेंगे कि भारत में क्या हो रहा है। वैसे राहुल गांधी ने अपना एजेंडा साफ कर दिया है। उन्होंने साफ कहा है कि वे कारोबार विरोधी नहीं हैं। उन्होंने कहा कि वे एकाधिकारवाद के विरोधी हैं यानी दो चार लोगों के हाथ में सब कुछ सौंप देने का वे विरोध करते हैं। राहुल ने यह भी कहा कि अच्छे और ईमानदार उद्योगपति उनसे मिलते हैं तो उनकी बातों से सहमत होते हैं। उन्होंने कहा कि एकाधिकारवादी पूंजीपति राष्ट्रीय संस्थाओं के लिए ठीक नहीं हैं, प्रतिस्पर्धा के लिए ठीक नहीं हैं और छोटे उद्यमियों के लिए भी ठीक नहीं हैं।

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